क्या ऐसे पढ़ेगा इंडिया..? क्या ऐसे शिक्षित होगा हमारा झारखंड..?सरकार के द्वारा किये गए दावों की पोल खोलती पलामू जिले का यह स्कूल

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मेदिनीनगर/नितेश तिवारी: एक ओर जहां सरकार शिक्षा को दुरुस्त करने के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है ,डिजिटल इंडिया का ढिंढोरा पीट रही है और निजी विद्यालयों से सरकारी विद्यालयों की तुलना कर रही है। वहीं दूसरी ओर राज्य के पलामू जिले के सतबरवा प्रखंड से करीब 15 किमी दूर सुदूरवर्ती क्षेत्र के सोहड़ी गांव में स्थित स्तरोन्नत प्लस टू उच्च विद्यालय है। जहां वर्ग 1 से 12 तक की पढ़ाई होती है। विद्यालय का निर्माण करोड़ों की लागत से हुआ है। लेकिन विद्यालय तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है। बताते चलें कि यह विद्यालय आजादी से पूर्व ही 1940 से ही स्थापित है। जो उस वक्त तो प्राथमिक था। जिसे 2017 में प्लस 2 कर दिया गया। लेकिन अब तक विद्यालय को सड़क नसीब नहीं हुई है। विद्यालय में सारी सुविधाएं हैं जो एक निजी विद्यालय में होनी चाहिए । यहां पर स्मार्ट क्लासरूम , कंप्यूटर लैब , टैब लैब ,विज्ञान प्रयोगशाला और यहां तक कि सरकार ने पर्याप्त शिक्षकों को भी दे रखा है, बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, सुख सुविधा की कोई कमी नहीं है।

लेकिन इसे मूर्खता कहें या सरकार की कमजोरी, पर विद्यालय तक पहुंचने के लिए गांव की मुख्य सड़क से कोई रास्ता नहीं है। बच्चे और शिक्षक प्रतिदिन एक संकरी सी पगडंडी से होकर विद्यालय पहुंचते हैं। जिसमें उन्हें काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है । विद्यालय तक कोई भारी-भरकम सामान भी नहीं ले जाया जा सकता है। बात अगर करें एमडीएम के चावल की, विद्यालय मरम्मती के लिए प्रयोग किए जाने वाले सामग्रियों या गैस सिलेंडर की और यहां तक कि विद्यालयों में बच्चों के लिए बांटे जाने वाली फ्री किताबों की,तो ये सब विद्यालय तक ले जाने में शिक्षक और विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्यों के पसीने छूट जाते हैं। क्योंकि विद्यालय तक पहुंचने की कोई सड़क है ही नहीं है ,नाममात्र की एक पगडंडी है, और वह भी निजी हैं। अगर रैयतों की मर्जी नहीं हुई तो पगडंडी भी बंद। विद्यालय बहुत शानदार है झारखंड राज्य का यह पहला विद्यालय है जहां बच्चे सरकार द्वारा घोषित नए परिधान में प्रतिदिन समय से पहुंचते हैं।

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विषय वार शिक्षक भी उपलब्ध हैं जो अपने विषयों को पढ़ाते हैं ,जो विभिन्न राज्यों के भी हैं लेकिन जब यहां तक आप पहुंचेंगे तो आपको महसूस होने लगेगा कि आखिर ऐसी जगह पर सरकार ने स्कूल क्यों बनाया ?और अगर बनाया, तो पहुंचने के लिए मार्ग का प्रबंध क्यों नहीं किया। जहां थोड़ी सी भी बारिश हुई कि बच्चे हाथों में चप्पल लेकर ,जहां उनके पैर कीचड़ में सन रहे हैं और उनका पोशाक, उनकी किताबें खराब हो रही है, नाली नुमा सड़क से गुजरने को मजबूर हैं। यह सोचने पर विवश करती है कि क्या ऐसे ही बढ़ेगा इंडिया? विद्यालय के प्रधानाध्यापक भरदुल कुमार सिंह बताते हैं कि वर्ष 2017 से वे यहां है और उन्होंने काफी प्रयास किया कि विद्यालय तक सड़क हो। लेकिन लाख प्रयत्नों के बाद भी सड़क नही बना। इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि रास्ता रैयती जमीन में है। जो ग्रामीणों की है और ग्रामीण जमीन देना नही चाहते हैं। जबकि सरकारी जमीन जो सड़क के लिए थी उसका कोई अता पता नहीं है। ग्रामीणों के वर्चस्व की लड़ाई के बीच पीस रहे हैं गरीब बच्चे। इस मामले में सरकार को ही मजबूत इरादों के साथ पहल करनी होगी तभी शायद विद्यालय के बच्चों को सड़क नसीब हो पाएगी।

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