पंचायतों का तुगलकी फरमान, बन रहा जान पर आफत पढ़िए यह खास रिपोर्ट

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रिपोर्ट: – सोनी पाण्डे

लाइव पलामू न्यूज/मेदिनीनगर: पंचायत का क्या काम है? यही न कि छ़़ोटे- मोटे झगड़े, झंझट, फसाद हो तो उसका निपटान आसानी से हो जाए और लोगों को थाना, न्यायालय आदि का चक्कर न लगाना पड़े। लेकिन इन दिनों जिले की पंचायतों के लिए गए फैसले सवाल खड़ा कर रहें हैं। ये उस वक्त की याद दिला रहें हैं जिस वक्त जब पलामू के नक्सली संगठन जनअदालत लगा कर अपना फैसला सुनाते थे। वो फैसला कम तानाशाही ज्यादा थी। जिसे मानना मजबूरी थी। नक्सल संगठनों का वह दौर तो समाप्त हो चुका है। लेकिन उनकी जगह सामाजिक पंचायतें अब तानाशाही वाले फैसले सुना रही है। फिलहाल की ही घटना को ले लेते हैं। जहां रामगढ़ थाना क्षेत्र में एक विवाहिता को ग्रामीणों ने उसकी प्रेमी के साथ पकड़ लिया था। जिसके बाद दोनों के हाथ पैर बांधकर पिटाई की गई और तो और इस पिटाई का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस फैसले का असर रहा कि विवाहिता की हत्या कर दी गई।

इन दिनों खासकर 2016-17 के बाद समाजिक पंचायतों ने कानून अपने हाथ मे लेना शुरू कर दिया है सामाजिक पंचायतों द्वारा कानून को हाथ लिए जाने के बाद हिंसक घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। मामला चाहे दुष्कर्म, यौन शोषण, प्रेम प्रसंग का ही क्यों न हो। सामाजिक दबाव में लोग हत्या आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं जो कि काफी घातक है। कभी -कभी पंचायतों का फैसला एक तरफा होता है। एक उदाहरण से समझिए, अगस्त 2021 में रामगढ़ में भरी पंचायत में दुष्कर्म पीड़िता को बदचलन साबित कर 40 हजार का जुर्माना लगाया गया था। जिसके बाद लड़की के पिता ने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया था। दूसरा मामला पांकी थाना क्षेत्र का है जहां पंचायत में महिला को डायन कहा गया था। वहीं तरहसी इलाके के में दुष्कर्म के मामले में पंचायत हुई थी और आरोपियों पर जुर्माना लगाकर समझौता करवा दिया गया था। ये मात्र उदाहरण हैं और कई ऐसी घटनाएं होंगी जो प्रकाश में ही नहीं आती।

ये समाजिक वैमनस्यता को बढ़ाने का काम कर रही है। वर्ष 2017- 18 में पलामू के पाटन में कानून को अपने हाथ में लेने पर पंचायत करने वालों तकरीबन 125 लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई थी। जिसके बाद पुलिस ने यह व्यवस्था लागू की थी कि अगर गांव में किसी भी तरह की सामाजिक पंचायत होती है तो इसकी सूचना पुलिस को उपलब्ध करवाना अनिवार्य होगा। हालांकि इस कानून का कितना पालन हो रहा यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। पंचायतों को यह बात समझनी होगी कि कानून से बढ़कर उनका फैसला नहीं है। वहीं वैसे मुद्दे जो संवेदनशील हों और जिसका कानूनी उपचार किया जाना आवश्यक हो उसे कानून को ही सलटाने में समाज और लोगों दोनों की भलाई शामिल हैं।

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