न्याय की आस में 31 वर्ष से बाट जोहती वो पथरीली आंखें, आज उन्हें मिला होगा कुछ सुकून

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लाइव पलामू न्यूज/मेदिनीनगर: अक्सर आपने न्यायालयों में लोगों को न्याय की बाट जोहते देखा होगा। जब इन्हीं बाट जोहते चेहरे को न्याय मिलती है तो उनके तनाव भरे चेहरे अचानक ही चैन की लम्बी सांस भरते भी दिखने लगते हैं। ऐसे ही न्याय की बाट जोह रहे राजदेव रजवार ने चैन की सांस ली जब उन्हें न्यायालय ने बेकसूर ठहराते हुए अपना फैसला सुनाया। पलामू में अनुमण्डल न्यायिक दण्डाधिकारी के न्यायालय द्वारा अभियुक्त राजदेव रजवार को बाइज्जत बरी कर दिया गया है। लेकिन इसी मुकदमें में नामजद अन्य अभियुक्त जयराम रजवार की किस्मत में ये पल देखना भी मुनासिब नहीं हुआ और इस मुकदमे के दौरान ही उनकी मृत्यु भी हो गई। उस अभागे के परिवार में कोई भी इस फैसले को सुननेवाला भी नहीं बचा था, काल ने पत्नी और बच्चे को पहले ही निगल लिया था।


बहरहाल, न्यायालयों में तो मुकदमें होते रहते हैं और सजा सुनाने एवं बरी करने का सिलसिला तो चलता ही रहता है, तो फिर आज अचानक एक मुकदमें में बरी किए जाने की इतनी चर्चा क्यों चल रही?? तो बता दें कि यह मुकदमा है ही कुछ ऐसा, इसमें न्याय एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं , पाँच नहीं बल्कि पूरे इक्कतीस (31) वर्षों बाद मिला है। पलामू के लिहाज से यह फैसला एक ऐतिहासिक फैसला रहा है। उल्लेखनीय है कि 1991 में GR संख्या 1213 /91 के रुप में एक मुकदमा दर्ज हुआ था जिसमें राजदेव रजवार एवं जयराम रजवार एवं अन्य को अभियुक्त बनाया गया था। यह वो दौर हुआ करता था जब अविभाजित बिहार में उग्रवाद अपने चरम पर था। दरअसल मुकदमा दर्ज कराने वाले व्यक्ति का नक्सलियों द्वारा अपहरण कर लिया गया था एवं फिरौती की माँग की गई थी । इसी सूचना के आधार पर मोहम्मदगंज के गोराडीह के अंतर्गत फुलियाडीह टोला के निवासी राजदेव रजवार तथा जयराम रजवार का नाम भी अभियुक्त के रूप में नामजद हो गया। यहीं से शुरु हुआ अपनी-अपनी बेगुनाही साबित करने की कानूनी लड़ाई लड़ने का। मुकदमें में लगती तारीखों ने तो जयराम रजवार की तारीख में फैसले की तारीख नहीं लिखी थी और बीच में ही सांसों की डोर ने उसका साथ छोड़ दिया। अन्य अभियुक्तों के मामले का निष्पादन तो हो चुका था लेकिन पीछे छूट गए थे ये दोनों। चार्ज शीट दाखिल न हो पाने से इनके मामले लम्बित होते चले गए। जयराम रजवार के निधन के बाद रह गए तो सिर्फ 72 वर्षीय राजदेव रजवार और वह अपनी बेगुनाही के लिए पिछले 31 वर्षों से न्यायालय की ओर टकटकी लगाए बैठे थें। साल दर साल गुजरते चले जा रहे थे। किन्तु फैसला नहीं आ पा रहा था।

तभी इसी साल इस मामले में बचाव करने पलामू व्यवहार न्यायालय के जाने माने अधिवक्ता विक्रांत कुमार सिंह से संपर्क किया गया रजवार एवं उसके परिवार द्वारा। वर्षों से लम्बित इस मुकदमें का रुख यहीं से बदला। अधिवक्ता विक्रांत कुमार सिंह की इस मुकदमें में मेहनत रंग लाई और बचाव पक्ष की ओर से दी गई उनकी दलीलों को अदालत ने उपयुक्त माना तथा इस मामले में अपना फैसला सुना दिया। न्यायालय ने अपने फैसले में अभियुक्त राजदेव रजवार को उसके रूप लगाए गए सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया। भले ही इस फैसले के आते आते 31 साल लग गए, बावजूद इसके इस फैसले ने राजदेव रजवार वर्षों पुराने जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास किया। वहीं राजदेव रजवार एवं उनके परिवारजन निःशब्द हैं कि वे अधिवक्ता विक्रांत कुमार सिंह का आभार कैसे व्यक्त करें जिनके सजग प्रयास से आज सालों से लम्बित न्याय हो पाया अन्यथा राजदेव की न्याय मिल पाने की आशा लगभग धूमिल ही हो चुकी थी।

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