शिक्षक दिवस विशेषांक: ‘शिक्षक व शिक्षा कल और आज’ पढ़िए इस विषय पर एक शिक्षक के विचार

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लेखक:- अर्पण गुप्ता

राजकीयकृत स्तरोन्नत प्लस टू उच्च विद्यालय सोहडीखास,सतबरवा के विज्ञान शिक्षक

लाइव पलामू न्यूज: कबीर की यह पंक्तियां ‘ गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पांव।
बलिहारी गुरु आपनू गोविंद दिया बताय।। का अर्थ अत्यंत गहरा है।
‘गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः गुरुर साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः’


गुरू की महिमा अपरंपार है। माता- पिता के बाद अगर कोई है जो हमारा हित चाहता है तो वह है हमारे गुरु। माता-पिता जहां एक ओर हमारे जन्म के लिए उत्तरदाई हैं, वहीं जिंदगी के महत्वपूर्ण पहलुओं को सिखाने और समझाने की बारीकियां हमें गुरु सिखाते हैं अर्थात दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। शिक्षक को समाज की रीढ़ कहा जाता है क्योंकि वह हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं हमारे भविष्य को आकार देने और हमें आदर्श नागरिक बनाने में मदद करते हैं। जिससे हमारे देश का समुचित विकास हो सके। माता-पिता बच्चों को जन्म देते हैं उनका कर्ज कोई नहीं उतार सकता लेकिन भारतीय संस्कृति में शिक्षक को माता-पिता से भी उच्च दर्जा दिया गया है क्योंकि हम बिना शिक्षा के समाज में रहने की योग्य नहीं रह जाते।

हमारे पास संस्कारों और भाव का अभाव रहता है। आज भी बहुत से शिक्षक शिक्षिका आदर्शों पर चलकर और आदर्श मानव समाज की कल्पना में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन कुछ अपवाद ऐसे भी शिक्षक हैं जो शिक्षा के नाम को कलंकित कर रहे है। ऐसे शिक्षकों ने शिक्षा को एक व्यवसाय बना दिया है जिससे विद्यार्थी को शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है। धन के अभाव में पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। शिक्षक ज्ञान और विद्या के दाता हैं। वे हमें न केवल किताबी ज्ञान देते हैं बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं । भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति में अनौपचारिक तथा औपचारिक दोनों प्रकार के शैक्षणिक केंद्र थे। औपचारिक शिक्षा मंदिर ,आश्रम और गुरुकुलो के माध्यम से दी जाती थी ।

जो उच्च शिक्षा के केंद्र भी थे। जबकि परिवार, पुरोहित, पंडित ,सन्यासी और त्योहारों के माध्यम से अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त होती थी । विभिन्न धर्म सूत्रों में उल्लेख है कि माता-पिता ही बच्चों के श्रेष्ठ गुरु हैं। कुछ विद्वानों ने पिता को भी एक शिक्षक के रूप में स्वीकार किया है। जैसे जैसे सामाजिक विकास का दायरा बढा है वैसे-वैसे शैक्षिक संस्थाएं स्थापित होने लगी है। गुरुकुल की स्थापना वनों- उपवनों , ग्राम या नगरों में होती थी । वनों में गुरुकुल कम होते थें। बाल्मीकि ,संदीपनी, कण्व आदी गुरुओं के आश्रम वनों में थे। प्राचीन काल के गुरु अपने बच्चों एवं अपने गुरुकुलों के लिए आम जनमानस से दान लिया करते थे।कभी कभी गुरुओं को क्षेत्रीय राजा अपने अधीन रखते थे और उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करके राज्य चलाया करते थे ।

ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन काल में स्त्रियों को शिक्षा प्रदान नहीं की जाती थी। लेकिन वैदिक युग में स्त्रियां यज्ञोपवीत धारण कर वेद अध्ययन एवं सायं प्रातः धूप दीप करती थी। हरित संगीता के अनुसार वैदिक काल में शिक्षा ग्रहण करने वाली दो प्रकार की कन्याएं होती थी ब्रह्मवादिनी और सद्योवात अर्थात 15 – 16साल की उम्र तक शिक्षा ग्रहण करती थीं। जब तक उनका विवाह नहीं हो जाता था, उन्हें वैदिक मंत्र, संगीत और नृत्य की शिक्षा दी जाती थी। वर्तमान समय में शिक्षा का परिदृश्य बिल्कुल ही बदल गया जहां गुरुकुल हुआ करते थे वहां अब विद्यालय खुल गए हैं। विद्यालय भी दो प्रकार के हैं सरकारी व निजी। सरकारी विद्यालय जो सरकारों द्वारा स्थापित हैं जिन विद्यालयों में सभी बच्चों को एक समान रूप से शिक्षा दी जाती रही है। सरकारी विद्यालय कल भी थे और आज भी हैं।

पहले शिक्षकों की समाज में काफी प्रतिष्ठा हुआ करती थी। लोग उनसे अपने हर परिस्थितियों में सलाह लिया करते थे। उनका एक अलग ही सम्मान था, लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा का व्यवसायीकरण हो चुका है। अब गुरु ,सर कहलाने लगे हैं ,चमचमाती स्कूल की इमारतें और आधुनिक पहनावा अनायास ही अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। लेकिन क्या इन विद्यालयों में प्राचीन समय की शिक्षा मिलनी संभव है? जहां एक और सरकारी विद्यालयों में सरकार शिक्षकों की नियुक्ति परीक्षा लेकर और विभिन्न कसौटियों पर खरा उतरने के बाद करती वहीं दूसरी ओर निजी विद्यालयों में अपने आसपास के अप्रशिक्षित शिक्षकों को कम वेतन पर रख लिया जाता है।

सरकार भी प्रयास करती है कि वह सरकारी विद्यालयों में निजी विद्यालयों की तरह सुविधा दे पर राजनीतिक कमजोरी इसे बदहाल बनाती है। सरकारी विद्यालयों में आने के साथ ही बच्चे भी उस प्रकार से शिक्षा ग्रहण नहीं करना हैं जैसे उनकी रुचि निजी विद्यालयों में होती है । वे मानसिक रूप से निजी विद्यालयों को श्रेष्ठ मान चुके हैं। इसके साथ ही शिक्षकों के द्वारा भी लापरवाही की जाती है। इसका दोषी आखिर कौन है ? सरकार / शिक्षक / अभिभावक ? चलिए बातें करते हैं सरकार की तो, सरकार शिक्षकों को शिक्षा कार्य के अलावा बहुत सारे गैर शैक्षणिक कार्यों जैसे जनगणना, मतगणना बीएलओ कार्य ,राशन कार्ड ,आदि में लगाए रखती है। जिससे कि शिक्षक पढ़ाई से दूर होते जा रहे हैं और मानसिक रूप से कमजोर जिससे कि उनकी शैक्षणिक प्रतिभा भी धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है और बच्चों के पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

विद्यालयों में एम डी एम,जाति प्रमाण पत्र,बैंक खाता खोलवाने ,मेडिकल चेक अप करवाने की जिम्मेवारी भी शिक्षकों पर ही है। तो स्वाभाविक है शिक्षक अपने मूल कार्य से प्रभावित होंगे। आज जरूरत है एक ऐसी मजबूत इच्छाशक्ति की जहां सबसे पहले अभिभावकों को अपने अंदर एक विश्वास जगाना होगा कि सरकारी विद्यालयों में भी अच्छी पढ़ाई हो सकती है। साथ ही शिक्षकों को भी समाज को विश्वास में लेकर एक प्रण लेना होगा कि हम अपने सीमित संसाधनों के बाद भी अपने विद्यालय को सर्वश्रेष्ठ बनाकर समाज में एक नजीर पेश करेंगे । विद्यालय के बच्चों को अपना बच्चा मानकर शिक्षण कार्य शुरू करेंगे। साथ ही साथ सरकार को भी एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाना होगा। इस विद्या रूपी मंदिर में संसाधनों की उपलब्धता, शिक्षकों की नियुक्ति और सुविधाओं को उपलब्ध कराना होगा जिससे कि शिक्षा का प्राचीन स्वरूप लौट सके और शिक्षकों को फिर से पुराना सम्मान मिल सके।

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