गढ़वा के सुनेश्वर चौधरी, जिन्हें है हरियाली से बेहद प्यार विगत 30 वर्षों की अथक मेहनत की बदौलत पहाड़ों को पाट दिया हरियाली से पढ़िए उनकी कहानी

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लाइव पलामू न्यूज/गढ़वा: आज दशरथ मांझी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं। लेकिन जब उन्होंने पहाड़ों का सीना चीर राह बनाने की शुरुआत की थी तो लोग उन पर हंसते थें। लेकिन वे धुन के पक्के निकले। 22 वर्षों तक कड़ी मेहनत के बाद लोगों के लिए राह आसान कर दी। वैसे ही श्री बंशीधर नगर प्रखंड अंतर्गत चितविश्राम पंचायत के बंबा गांव निवासी सुनेश्वर चौधरी हैं। जिन्हें हरियाली से बहुत प्यार है। उन्होंने 30 वर्षों की कड़ी मेहनत से पहाड़ को हरा भरा कर दिखाया। पिछले तीन दशक से कड़ी मेहनत कर लगभग 10 एकड़ पहाड़ी क्षेत्र को उन्होंने हरा भरा कर लोगों को पर्यावरण संरक्षण का सकारात्मक संदेश दिया है।

उनकी दिनचर्या संतों की मानिंद है। पहाड़ी पर बनी कुटिया में रहना, गौ सेवा, पेड़ पौधों का संरक्षण और परमार्थ कार्य । उनके दिन की शुरुआत गौ सेवा से होती है। लोगों ने उनके निवास स्थल को आश्रम का नाम दे दिया है। यह सुनेश्वर की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है कि जहां आज हरियाली है, उस क्षेत्र के अगल बगल में आज भी पुटुस के पेड़ है। लेकिन उसके बीच में कई दुर्लभ पेड़ पौधे आज लोगों को आकर्षण का केंद्र हैं। वन विभाग को इतने क्षेत्रफल में हरियाली लाने के लिए लाखों रुपये ख़र्च करने पड़ते। लेकिन सुनेश्वर के हरियाली प्रेम और समर्पण की बदौलत यह क्षेत्र को स्वर्ग बन गया है। यहां के दुर्लभ पौधों एवं वनस्पतियों के बीच समय गुजार कर लोग सुखद अनुभूति महसूस करते हैं। 1990 में सुनेश्वर को विरक्ति हुई और वे भरा पूरा परिवार छोड़कर निमियादामर के जंगल में एक कुटिया बनाकर रहने लगे। घर सेअपने साथ एक देशी गाय भी लेकर पहाड़ी पर आए थे। उसी गाय से उनके पास वर्तमान में 40 से ऊपर गाय- बछड़े हैं। हालांकि वे इनका व्यवसायिक प्रयोग नहीं करते है। गाय के गोबर का प्रयोग खाद के रूप में पेड़ पौधों में प्रयोग करते हैं और अपने आवश्यकतानुसार दूध निकालकर बाकी बछड़ों को पिला देते हैं। सुनेश्वर बताते हैं कि उन्होंने आज तक यहां के एक फल और दूध आदि को कभी नहीं बेचा। पेड़ पौधों से लगाव के विषय में वे कहते हैं कि 1990 से पूर्व ही पूरा जंगल उजाड़ हो चुका था। उन्होंने पेड़ लगाना एवं जो थोड़े बहुत पेड़ बच गये थे उसे संरक्षित करना शुरू किया। पर यह राह इतनी आसान नहीं थी।


पौधों की सिचाई के लिए पहाड़ी पर अकेले दो- दो कुएं की खुदाई और बाल्टी से नियमित रूप से पौधों को पानी देना प्रारंभ किया। देखते- देखते उनकी मेहनत रंग लायी और पहाड़ी पर हरियाली लौट आई। उन्होंने उपवन से फल खाने एवं औषधि के लिए सबको छूट दे रखी है, लेकिन एक दातुन तक तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं है। सुनेश्वर के तैयार किये गये उपवन में कई दुर्लभ किस्म के पौधे विद्यमान है। जिसमें पीपल, बरगद , पियार, काजू, बादाम, चिरैता, साल, शंखपुष्पी, संतरा, काली हल्दी समेत कई दुर्लभ वनस्पतियां मौजूद हैं। इसके अलावा हर्रे, बहेरा, पाकड़, विभिन्न किस्म के आम, अमरूद, बेर, नीबू, शीशम, सागवान, करम, बरगद, पीपल, आँवला, गमहार और बांस इत्यादि के पौधे है। सुनेश्वर समयानुसार विभिन्न सब्जियां भी उगाते है अपने उपयोग के बाद जो भी सब्जी बचती है उसे लोगों के बीच निःशुल्क वितरित कर देते हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन प्रकृति को समर्पित कर दिया है। इन दिनों वे नवग्रह को साधने में जुटे हुए हैं। उन्होंने अपने आश्रम में नवग्रह एवं महादेव की स्थापना कर रखी है, जहां वे नित्य पूजा पाठ करते हैं। उन्होंने 2016 में आश्रम में यज्ञ भी कराया है।

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