राज्य अपने क्षेत्रों में धार्मिक या भाषाई आधार पर अल्पसंख्यक समुदाय को दे सकते हैं मान्यता: केंद्र सरकार

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लाइव पलामू न्यूज: केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से कहा कि वे अपने क्षेत्र के धार्मिक या भाषाई समूह को अल्पसंख्यक के रुप में मान्यता दे सकते हैं जैसा कि महाराष्ट्र सरकार ने 2016 में यहूदियों को अल्पसंख्यक घोषित किया था। ताकि वे अपने संस्थानों की स्थापना व संचालन कर सकें। ये बातें सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक सुनवाई के दौरान मोदी सरकार ने कही। आगे उन्होंने कहा कि राज्य अपनी नियम व शर्तों के अनुरूप संस्थान को अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में प्रमाणित कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट अल्पसंख्यक मंत्रालय की ओर से दायर एक याचिका पर भाजपा नेता सह अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने एक जनहित याचिका में बताया कि यहूदी, बहावाद और हिंदू धर्मों के अनुयायी जो का लद्दाख, कश्मीर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, लक्षद्वीप, अरुणाचल प्रदेश में अल्पसंख्यक हैं और पंजाब व मणिपुर में उनका प्रशासन भी नहीं है जिस कारण उनका कोई संस्थान भी नहीं है। इस विषय पर जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय उन सभी राज्यों में अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना व प्रशासन दोनों कर सकते हैं। राज्य सरकार अपने स्तर पर अल्पसंख्यक की पहचान के लिए दिशानिर्देश जारी कर सकती है। आगे उन्होंने कहा की अल्पसंख्यक मंत्रालय की स्थापना अल्पसंख्यकों के विकास व उनके सामाजिक आर्थिक विकास के लिए की गई है।

अकेले राज्य को अल्पसंख्यकों के लिए नीति निर्धारण की शक्ति नहीं दी जा सकती क्योंकि यह संवैधानिक रुप से गलत होगा और शीर्ष न्यायालय के कई फैसलों के विपरीत होगा। संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 का निर्माण किया गया है। अतः राज्य को अकेले अल्पसंख्यकों के लिए कानून बनाने की शक्ति मिलने पर संसदीय व्य्वस्था की शक्ति छिन लेगी जो संवैधानिक रुप से गलत होगा। अश्विनी उपाध्याय ने जनहित याचिका दायर करते हुए सुप्रीम कोर्ट से अल्पसंख्यक समुदाय की पहचान के लिए दिशा निर्देश जारी करने का मांग की और कहा कि 10 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं लेकिन केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए बनाए गए योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहें।

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