आरआरआर के रियल हीरो सीताराम राजू और कोमाराम भीम….. जाने कौन थे ये दोनों जिसपर बनी RRR

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लाइव पलामू न्यूज: क्या आप जानते हैं कि एसएस राजामौली द्वारा निर्देशित फिल्म आरआरआर के मुख्य किरदार रियल हीरो अल्लूरी सीताराम राजू और कोमाराम भीम से प्रेरित हैं। इन दोनों ने ब्रिटिश हुकूमत को उस दौरान नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया था। निर्देशक के अनुसार यह फिल्म उन्होंने रियल हीरो अल्लूरी सीताराम व कोमाराम भीम के जिंदगी से प्रेरित होकर बनाया है। उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिल पाने के कारण फिल्म में काल्पनिकता को भी जगह दी गई है।

इस फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि उनके जीवन में क्या हुआ था और अगर दोनों मिल जाते तो कहानी क्या होती। अल्लूरी सीताराम और कोमाराम भीम स्वतंत्रता इतिहास के गुमनाम हीरो हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में आदिवासियों के वन अधिकार के लिए तत्कालिक ब्रिटिश हूकूमत से पंगा लिया था। वर्तमान में वह क्षेत्र आंध्रप्रदेश व तेलंगाना के अंतर्गत आता है। 1882 में ब्रिटिश हूकूमत ने मद्रास फॉरेस्ट एक्ट लाकर वहां के आदिवासियों को जंगल जाने पर बैन लगा दिया था। इसके विरोध में ही दोनों ने लड़ाई लड़ी थी।


कोमाराम भीम:
सन् 1900 में आदिलाबाद के संकेपल्ली में जन्में कोमाराम के गोंड समाज से ताल्लुकात हुआ करता था। वे अंग्रेजी हूकूमत व हैदराबाद के निजाम के अत्याचारों के विरोध में खड़े हुए और अपनी आवाज बुलंद की। उन्होंने आदिवासियों के साथ मिलकर हैदराबाद की आजादी के लिए विद्रोह कर दिया। कोमाराम गोरिल्ला युद्ध में माहिर थें। एक बार की बात है कि फसल कटाई के दौरान निजाम के पटवारी लक्ष्मण राव व पट्टेदार सिद्दीकी ने गोंड लोगों को टैक्स को लेकर गालीगलौज करने लगे। आवेश में आकर कोमाराम ने सिद्दीकी की हत्या कर दी। फिर वे जान बचाने के लिए भाग गए। उन्होंने अंग्रेजी ,हिंदी, उर्दू पढ़ना लिखना सीखा। तत्पश्चात प्रेस में काम किया। उसके बाद वे असम के चाय बगानों में काम करने लगे। वहां उन्होंने मजदूरों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई।इस कारण जेल में डाल दिए गए। बाद में निजाम के खिलाफ आदिवासियों को इकट्ठा कर 1928 – 1940 तक गुरिल्ला युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।


अल्लूरी सीताराम राजू
1897 में विशाखापत्तनम में जन्में अल्लूरी राजू बेहद कम उम्र में ही अध्यात्म का रास्ता अपना लिया। वे महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित थें। वह आदिवासियों को शराब नहीं पीने की सलाह दिया करते थे। आपसी लड़ाई को आपस में ही मिलकर हल करने की सलाह देते थें। उन पर अंग्रेजों ने काफी जुल्म किया लेकिन वे अपने इरादे से नहीं डिगे। रांपा विद्रोह के 1922- 1924 के नेतृत्वकर्ता के रूप में उन्हें याद किया जाता है। 1924 में अंग्रेजों ने उन्हें पेड़ से बांध कर गोलियों से भून दिया था।

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