अगस्त क्रांति में पलामू के पांच भ्राता युगलों ने दिखाया था शौर्य, ‘करो या मरो’ नारा लगाते गए थे जेल (पार्ट-1)

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वरिष्ठ पत्रकार प्रभात मिश्रा
लेखक वरिष्ठ पत्रकार
प्रभात मिश्रा अमर उजाला

लाइव पलामू न्यूज़: अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ निर्णायक जंग का बिगुल फूंकने की तैयारी हो गई थी। बस समय का इंतजार था। पूरे देश के साथ पलामू जिले में युवाओं की टोली भारत माता को फिरंगियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने के लिए तैयार थी। असंख्य लोग ‘करो या मरो’, ‘जय हिंद’, ‘वंदेमातरम’ और ‘भारत माता’ की जय का नारा लगाते हुए गांव-गांव से लेकर शहर के गली-मुहल्लों में निकल पड़े थे। कितने लोग जेल गए इसका अंदाजा नहीं है पर अभी चर्चा पांच भाइयों की जोड़ी की। ये सभी आजादी की लड़ाई में न सिर्फ शामिल हुए बल्कि अंग्रेजों की नाकों में दम कर दिया।
ये भाई थे यदुवंश सहाय ‘यदु बाबू’-उमेश्वरी चरण ‘लल्लू बाबू’, गणेश प्रसाद वर्मा-नंद किशोर प्रसाद वर्मा, नीलकंठ सहाय-ऋषि कुमार सहाय, तीरथ प्रकाश भसीन-वेद प्रकाश भसीन और हजारी लाल साह- नारायण लाल साह। इनमें से पहले चार डालटनगंज के रहने वाले थे और पांचवे कोयल नदी पार शाहपुर के। इनके अलावा अटौला से गिरफ्तार किए गए परीक्षित तिवारी, देवराज तिवारी, यदुनंदन तिवारी आपस में चचेरे भाई थे तो चौकड़ी निवासी जगनारायण पाठक इनके फुफेरे भाई थे। यदु बाबू के बेटे कृष्णनंदन सहाय ‘बच्चन बाबू’ भी आंदोलन करते हुए जेल गए थे तो क्रांतिकारियों के नेता गणेश बाबू के साले गोकुल प्रसाद वर्मा को भी अंग्रेज सिपाहियों ने गिरफ्तार कर लिया था। पलामू में पकड़े गए लोगों को डालटनगंज, हजारीबाग और गया सहित कई अन्य जेलों में रखा गया था।
स्वतंत्रता सेनानियों के नाम शिलापट्ट

आठ अगस्त 1942 की शाम को बम्बई में कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन का प्रस्ताव पास किया गया था। इसके अगले दिन यानी नौ अगस्त सेपूरे देश भर में जुलूस, धरना, प्रदर्शन, प्रभातफेरी और अनशन का दौर शुरू हो गया। पलामू भी इससे कैसे अछूता रहता। यहां भी इस तरह की गतिविधियां अगस्त महीने के प्रारंभ से ही शुरू हो गईं थी। जिले में आंदोलनकारियों की दो धाराएं थी-एक का नेतृत्व यदुवंश सहाय कर रहे थे तो दूसरे के अगुआ गणेश प्रसाद वर्मा थे। पहले की शांतिप्रियता और ओज से अंग्रेज घबराते थे तो दूसरे की क्रांतिकारी सोच व तेज से उनके सामने आने से डरते थे। इन दोनों के साथ इनका परिवार ही नहीं पूरा जिला साथ देने के लिए तैयार रहता था।

नोट:- यदुवंश सहाय-उमेश्वरी चरण के बारे में जानें अगले अध्याय में

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