पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े थे पलामू के हजारीलाल साह, 1942 में डालटनगंज के शाहपुर से हुए थे गिरफ्तार

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वरिष्ठ पत्रकार प्रभात मिश्रा
लेखक वरिष्ठ पत्रकार प्रभात मिश्रा अमर उजाला

लाइव पलामू न्यूज़/पलामू: हजारीलाल साह की कठ-काठी भले साधारण थी पर अंग्रेजों से लड़ने का इरादा बहुत ही बुलंद था। भारत माता को फिरंगियों की बेड़ी से मुक्त कराने के लिए वे किसी भी तरह का बलिदान देने के लिए सदैव तैयार रहते थे। जंगे-आजादी में न उन्होंने सिर्फ अपनी संपत्ति गंवाई थी बल्कि सात साल के पुत्र को भी खोया था। इतना होने के बाद भी उनके इरादे टस से मस नहीं हुए। उनके सामने बस महात्मा गांधी का ‘करो या मरो’ का मंत्र था। इसी मंत्र के सहारे वह नौ अगस्त 1942 को शुरू हुए ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन में शामिल हुए थे। जब वे इस आंदोलन में शामिल हुए थे तो उनकी उम्र पूरे 31 साल की थी। उनका जन्म तीन अगस्त 1901 को शाहपुर में हुआ था।


अंग्रेजों के खिलाफ जनमानस तैयार करने के लिए वे चैनपुर, डालटनगंज, रंका, भंडरिया के गांव-गांव में घूमने लगे और लोगों से सरकार को मालगुजारी नहीं देने का आह्वान किया। हुकूमत उनसे इतनी घबरा गई कि उनपर 500 रुपये का इनाम रखा गया। एक बार शाहपुर में अंग्रेज सैनिकों ने उनके घर को घेर लिया। जब वे घर में नहीं मिले तो कुर्की कर ली गई और तोड़फोड़ की गई। देवब्रत पलामू के वरिष्ठ पत्रकार हैं और हजारी बाबू के भतीजे भी। वह बताते हैं, ‘मेरे चाचा और पिता (नारायण लाल साह) के मन में देश को स्वाधीन कराने और लोगों को अंग्रेजों के जुल्म से मुक्त कराने की भावना कूट-कूट कर भरी थी। दोनों आजादी की लड़ाई के दौरान जेल में बंद थे।

जिस दिन चाचा को पकड़ा गया था उस दिन वह कहीं बाहर से आकर घर में घीकुआर (एलोवेरा) का हलुआ बना रहे थे। घर से धुआं उठ रहा था। धुआं देखकर एक मुखबिर ने एसपी को इसकी जानकारी दे दी। पुलिस घर के आसपास घूमती रहती थी। वह तत्काल वहां पहुंच गई और चाचा को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद जब उन्हें पुलिस डालटनगंज ले जाने लगी तो मेरी उनसे मुलाकात कोयल नदी में हुई। मिलने पर चाचा जी ने कहा कि पता नहीं हम कब छूटेंगे, घर में हलुआ बना कर रखा हुआ है तुम खा लेना।’ गिरफ्तारी के बाद उन्हें पहले डालटनगंज जेल में और उसके बाद हजारीबाग जेल में रखा गया। यहीं वे जयप्रकाश नारायण से मिले और उनके विचारों से काफी प्रभावित हुए।

गिरफ्तारी के बाद घर की स्थिति हो गई थी काफी खराब
हजारी बाबू के बेटे हैं महेश प्रसाद बताते हैं की, ‘बाबूजी की गिरफ्तारी के बाद घर की स्थिति काफी खराब हो गई थी। उस समय मेरी उम्र एक वर्ष के करीब थी। मां हमलोगों को लेकर मामा के घर महाराजगंज में रही। हमलोगों की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मेरे बड़े भाई की मौत इलाज के अभाव में सात साल की उम्र में हो गई थी।’ महेश जी की पत्नी सेवानिवृत्त शिक्षिका हैं।

वह बताती हैं, ‘बाबू जी की दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे अपने जुड़वां बेटे नरेश प्रसाद की मौत से भी विचलित नहीं हुए थे। नरेश रेलवे पुलिस में थे और उनकी हत्या कर दी गई थी। बाबू जी उस वक्त भी नहीं टूटे थे जब कुर्की में घर का सारा सामान जब्त हो गया था और बच्चे ढक्कन में पानी पीने को मजबूर हुए थे। वह मुझे अपनी बहू नहीं मां कहते थे और मानते थे कि मेरी सेवा के कारण ही वह 107 साल तक जिंदा रहे। उनकी एक बेटी संयुक्ता देवी भी थीं।’

हजारी बाबू की पढ़ाई कहां से हुई थी
हजारी बाबू के पिता महादेव साह एक व्यापारी और मां भाग्य वाणी देवी एक धार्मिक महिला थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा शाहपुर के प्राइमरी स्कूल में और हाई स्कूल की पढ़ाई जिला स्कूल में हुई। उनमें देशभक्ति का जज्बा ऐसा था कि एक अगस्त 1920 को जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन चलाया तो उन्होंने उनके आह्वान पर पढ़ाई छोड़ दी और आंदोलन में कूद पड़े। घर वालों के समझाए जाने के बावजूद उन्होंने इरादा नहीं बदला।

उस समय कांग्रेस का पलामू जिला कार्यालय डालटनगंज के हमीदगंज में रहने वाले गनौरा सिंह के घर में था। कांग्रेस के जिला सचिव चंद्रिका लाल ने इनकी सक्रियता और कर्मठता से प्रभावित होकर इन्हें जिला उपसचिव बना दिया। इसके बाद ये चैनपुर, रंका, भंडरिया और गढ़वा के आदिवासी बहुल गांव में जंगल, घाटी, पहाड़ों में पैदल ही अंग्रेजी पुलिस से बचते हुए संगठन खड़ा करने में जुट गए।

गांधी जी के सच्चे एक्वाइट थें हजारी बाबू
हजारी बाबू गांधी जी के सच्चे अनुयाई थे। 1930 में गांधी जी की ‘हरिजन’ पत्रिका आने पर वे उसे खुद तो पढ़ते ही थे इसकी बातों से लोगों को जागृत भी करते थे।उन्होंने डाल्टनगंज, चैनपुर, गढ़वा और नगर उंटारी के गांव में हरिजन स्कूल खोला और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गांधीजी के नक्शे कदम में चलते हुए उन्होंने जात-पात के खिलाफ लोगों को एकजुट करना शुरू कर दिया। परिणाम स्वरूप 1932 में इनकी बिरादरी ने इन्हें जाति से बाहर कर दिया।

1932-33 में हजारी बाबू ने दो बार काटी जेल
बिरादरी के इस फैसले से दृढ़ संकल्प के धनी हजारी बाबू विचलित नहीं हुए और अपनी सामाजिक कार्यों में अपनी सहभागिता जारी रखी। |1932-33 में इन्हें एक बार चार महीने और दूसरी बार छह महीने के लिए जेल में रखा गया। जेल से निकलने के बाद वे आजादी की लड़ाई में और अधिक सक्रिय हो गए। 1937 में वे पलामू डिस्टिक बोर्ड में मेंबर बनने के लिए भंडरिया थाने से चुनाव में खड़े हुए। उस चुनाव में उन्हें भारी मतों से जीत हासिल हुई।

1940 में एक अधिवेशन करने पर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर भेज दिया था जेल, जेल जाने के बाद दुकान की समान और घोड़े की अंग्रेजों ने कर दी थी नीलामी
हजारी लाल साह ने निस्वार्थ भाव से जगह-जगह सम्मेलन कर लोगों की समस्याओं को पुरजोर ढंग से उठाते थे और उन्हें दूर करने में दिन-रात एक कर देते थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस के अधिवेशन में इनका साथ देने के लिए इनकी पत्नी देवमती देवी भी महिला स्वयंसेविका बनकर शामिल हुई थीं। पत्नी के अलावा इनके छोटे भाई नारायण लाल साह भी हर कदम पर उनके साथ रहते थे। 1941 में हजारी बाबू ने आदिवासी बहुल भंडरिया थाना में सभा कराई और अपने भाषण से लोगों को बहुत प्रभावित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि दूसरे दिन ही इन्हें जेल में डाल दिया गया। साथ ही इनकी दुकान का समान और घोड़ों की नीलामी भी करवा दी गई।

एक स्वतंत्रता सेनानी की पौत्रवधू होना गर्व की बात
वे महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण के सच्चे अनुयाई थे। आजादी के बाद उनका ज्यादा समय सामाजिक कार्यों में बीतता था। 1952 में पलामू में भूदान आंदोलन में आचार्य विनोबा भावे यहां तीन बार आए थे। साह हमेशा विनोबाजी और उनके भूदान आंदोलन के साथ थे। रेणु कुमारी जायसवाल शिक्षिका हैं और हजारी बाबू के पोते प्रेमशंकर की पत्नी हैं। वह कहती हैं, ‘एक स्वतंत्रता सेनानी की पौत्रवधू होना उनके लिए गर्व की बात है। दादा जी का जीवन संघर्ष से भरा था। दादी उनके संघर्ष में सदैव साथ देतीं थी। वह बच्चों को पढ़ा कर और तिरंगा बनाकर बेचती थीं।

इससे घर का खर्च चलता था। दादा जी नारी स्वतंत्रता के भी मुखर समर्थक थे। वे मुझसे पर्दा करने पर कहते थे कि पुराने जमाने की तरह क्यों रहती हो। वे सादा जीवन जीते थे। धन कमाने और शान-शौकत की जिंदगी जीना उन्हें पसंद नहीं था। भोजन भी काफी सादा करते थे। बहुत इच्छा होती थी तो मुझे मोहनभोग बनाने के लिए कहते थे।’ रेणु जी बताती हैं, ‘प्रतिदिन चरखा चलाकर सूत कातने और उसी से निर्मित खादी का धोती-कुर्ता और टोपी पहनने वाले हजारी बाबू जीवन के अंतिम दिनों में वर्तमान व्यवस्था से काफी दुखी थे।

उनका कहना था कि आंदोलन के दौरान जो सपना हमलोगों ने देखा था वह पूरी तरह टूट गया। पूरे समाज में स्वार्थी और भ्रष्ट लोग भर गए हैं। आज के नेता पूरे देश को नहीं देखकर अपने-अपने परिवार के विकास में लगे रहते हैं। इनके व्यक्तिगत स्वार्थ के आगे देश व समाज का कोई अस्तित्व नहीं रह गया है।’ हजारी बाबू के पोते सत्यदीप और पोती करुणा कुमारी हैं। परिवार शाहपुर में ही रहता है। उनहोंने 26 फरवरी 2008 को यहीं 107 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस ली।


आज इस महान स्वतंत्रता सेनानी की 120वीं जयंती है। आपको लाइव पलामू न्यूज और पलामूवासियो एवं देशवासियों की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।

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