पलामू के सौंदर्य को बंगालियों के जनमानस में अंकित करने वाले अब नहीं रहे बुद्धदेव गुहा।

LIVE PALAMU NEWS

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात मिश्रा
लेखक वरिष्ठ पत्रकार
प्रभात मिश्रा अमर उजाला
live palamu news: पलामू के सौंदर्य को बंगालियों के जनमानस में अंकित करने वाले बुद्धदेव गुहा का जाना दिल को कचोटने वाली घटना है। मैं बांग्लाभाषी नहीं हूं पर अपने मित्रों कौशिक मल्लिक, दिव्येंदु गुप्ता ‘गोरा’ और सैकत चटर्जी से अनगिनत बार गुहा की महान कृति ‘कोयलेर काछे’ की कथा सुन चुका हूं। इनकी इस किताब में पलामू की गंगा कोयल की कथा तो है ही बेतला, केचकी, नेतरहाट, महुआ़़डांड़, मारोमार, बारेसांड़ के प्राकृतिक सौंदर्य का भी सजीव चित्रण है। शीघ्र ही इनकी बेतला पर किताब आने वाली है।
RAKESH MEMORIAL HOSPITAL
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इसमें खाना बनाने वाले खैरूल और कौशिक मल्लिक का जिक्र है। इनकी कहानियों में आरके विश्वास, रोमेन बोस जैसे डालटनगंज के लोगों का जिक्र भी है। कौशिक मल्लिक ने न जाने कई बार उनसे कोलकाता में मुलाकात की। आखिरी मुलाकात का जिक्र करते हुए कौशिक कहते हैं, ‘जब मैं पालीगंज के सन्नी टावर के घर में पहुंचा तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया। अपनी पुस्तक ‘एक्टो उष्णोतार जन्ने’ भेंट की और उस पर लिखा ‘कौशिश मल्लिक, सप्रेम भेंट, 22.9.2018’। इस पुस्तक में मैक्लुस्कीगंज का जिक्र है।
‘ 1970 से 1990 तक लगातार पलामू आने वाले बुद्धदेव गुहा की एक बार फिर पलामू आने की इच्छा थी पर वह अधूरी रह गई। कौशिक ने उनकी बड़ी बेटी मालिनी गुहा से बात कर पलामू के लोगों की भावनाओं से अवगत कराया। बुद्धदेव गुहा को पढ़ने के बाद ही सैकत ने उपन्यासों को गंभीरता से पढ़ना शुरू किया। वह कहते हैं, ‘बुद्धदेव गुहा मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं। उन्होंने जिस तरह के पलामू के प्राकृतिक सौंदर्य को शब्दों में ढाला है वह अद्भुत है। जंगल की खूबसूरती से जुड़ी मेरी फिल्में कहीं न कहीं बुद्धदेव गुहा से प्रभावित रही हैं।’

गुहा निधन 29 अगस्त की रात्रि में कोलकाता में हो गया। उनका जन्म 29 जून 1936 को कोलकाता में हुआ था, उनका बचपन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के रंगपुर और बारीसाल जिलों में बीता। उनके बचपन के अनुभवों और यात्राओं ने उनके दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी, जो बाद में उनके लेखन में दिखी। उन्हें 1976 में आनंद पुरस्कार, इसके बाद शिरोमन पुरस्कार और शरत पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
‘मधुकरी’ और ‘सविनय निबेदन’ उनकी काफी मशहूर पुस्तकें है। पुरस्कार विजेता बंगाली फिल्म ‘डिक्शनरी’ उनकी दो रचनाओं ‘बाबा होवा’ और ‘स्वामी होवा’ पर आधारित है। पेशे से चार्टड अकाउंटेंट गुहा एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और एक कुशल चित्रकार भी थे

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