देश में बढ़ते रेप की मामले और खत्म होता क़ानून का भय

लाइव पलामू न्यूज: देश में एक तरफ जहाँ बेटी पढ़ाओं और बेटी बचाओ का नारा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी और देश में हर दिन बढ़ते रेप के मामले इस बात का सबूत है अपराधी बेखौफ हो गए है और उनमे क़ानून का भय खत्म हो गया है। देश में निर्भया काण्ड हो, गुड़िया काण्ड हो या उन्नाव कांड ये कुछ ऐसे उदाहरण है जो हमारे दिमाग में तरोताजा है और इन वीभत्स घटनाओं के बाद देश में एक क्रांति एक मुहीम दिखी थी लोगों में ऐसा कुकृत्य करने वाले अपरापपधियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की। रेप के कुछ मामलों में अपराधियों को सजा तो हुई लेकिन वह सजा मिलने में इतनी देर हुई और वह सजा इतनी नाकाफी थी कि अपराधियों में खौफ बना ही नहीं। इसका ताजा उदाहरण है बिहार के सुपौल में हुआ रेप कांड , जिसमें नाबालिग सहित तीन महिलाओं से गैंगरेप और एक पीड़िता की हत्या हो गई।साल 2019 में हुई इस घटना का फैसला हाल ही में हुआ है जिसमें सुपौल की अदालत
धारा 302 में अनमोल यादव को मृत्युदंड के साथ 20 हजार के जुर्माना की सजा सुनायी। जुर्माना की राशि नहीं देने पर दो साल कारावास की सजा भुगतनी होगी। 302/34 भादवि में अनमोल यादव, अलीशेर, अयूब और जमाल को मृत्युदंड के साथ 20-20 हजार का जुर्माना भी लगाया है।

जुर्माना नहीं देने पर दो महीने कारावास की सजा होगी। साथ ही पॉक्सो एक्ट में नाबालिग के साथ गैंगरेप के लिए अलीशेर, अयूब और अनमोल यादव को फांसी की सजा दीगई। कोर्ट ने चारों को आजीवन कारावास (अंतिम सांस तक) व 50-50 हजार का जुर्माना लगाया है। जुर्माना नहीं देने पर अभियुक्तों को छह माह की सजा होगी। रेप से पहले लूटपाट में10 साल का कारावास और 30-30 हजार के जुर्माने की सजा दी गई।

जुर्माना नहीं देने पर एक साल की सजा होगी। इसके अलावा धारा 341 में एक माह की कैद व जुर्माना, धारा 342 में एक साल की सजा, 323 के तहत एक साल की जेल व आर्म्स एक्ट में सात साल का कारावास और पांच-पांच का जुर्माना लगाया है। जुर्माना नहीं देने पर एक साल कारावास की सजा सुनाई है।
अब आप ही बताइये क्या ऐसे अपराधियों की ये सजा काफी है और वो भी साल 2019 में हुई इस घटना की अंतिम सुनवाई मई साल 2022 में हुई है यानी घटना के लगभग तीन साल बाद। निर्भया काण्ड में भी कुछ ऐसा ही हाल था उसमें से एक अपराधी नाबालिग था ,लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि जब कोई नाबालिग किसी का रेप करता है तो उसमे वह नाबालिग नहीं है उसे सब समझ में आता है लेकिन जब सजा भुगतने की बारी आती है तो नाबालिग कह कर उसे वक्त दिया जाता है। सनी देओल की फिल्म का एक मशहूर डायलॉग है ‘तारीख पर तारीख’ ये बिलकुल सही है पीड़िता अपने दर्द से उभर नहीं पाती और अदालतें ऐसे मामलों में फैसला लेने में इतनी देर करते है कि लोगों के भीतर से इस मामले में क़ानून को लेकर कोई भय ही नहीं है। अगर इसके लिए कोई कड़ा कानून होता और तुरंत अपराधी को सजा होती तो शायद आज देश में हर दिन लगभग 88 से ज्यादा मामले सामने नहीं आते। बिहार का स्थान इस मामले में टॉप टेन में है। औद्योगिक क्षेत्र में बिहार तरक्की करे ने करे अपराध में तरक्की जरूर कर रहा है। बहरहाल देश में बढ़ते रेप के मामलों को देखकर यह तो साफ़ हो गया है कि बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा तब तक सफल नहीं होगा जब तक देश में ऐसे मामले थमेंगे नहीं और इसके लिए सरकार को कड़े से कड़े क़ानून तुरंत पास करने की आवश्यकता है। अदालत भी ऐसे मामलो में जल्दी और कड़ी कार्रवाई करे और अगर नहीं तो इस मामले में पीड़ित को यह अधिकार दे कि इस तरह की घटना को अंजाम देने वालों को सजा देने की वह हकदार होगी।

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