चैनपुर की रथयात्रा, आइए जाने 1960 और 1980 के दशक में कैसे होते थें भगवान जगरनाथ की रथ यात्रा मे माहौल

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लाइव पलामू न्यूज़ : आज रथयात्रा है। यूं कहें तो जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में पूरी दुनिया से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है पर पलामू प्रमंडल वासी सैलाब की शक्ल में चैनपुर की रथयात्रा में शामिल होते थे। इस साल भी चैनपुर की रथयात्रा कोरोना के कारण स्थगित कर दी गई है। इस रथयात्रा का लगभग दो सौ साल का इतिहास है और ऐसा दूसरी बार हुआ है कि यह आयोजन कोरोना कि वजह से स्थगित हुआ है। जैसे ही इस यात्रा के स्थगित होने की सुचना पत्र प्रशासन द्वारा जारी किया गया उसे सुनकर मन व्यथित हो गया और यादों के दरिया में लहरें उफान मारने लगीं।

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चैनपुर पलामू के मुख्यालय डालटनगंज (मेदिनीनगर) से करीब चार किलोमीटर दुरी पर स्थित चैनपुर राजागढ़ मे भगवन जगन्नाथ विराजमान है। यही से रथ यात्रा कि शुरुआत होकर चैनपुर की रथयात्रा किशुनदाहा तक जाती है। यहाँ भगवान की मौसी बाड़ी है । बात 1980-82 के समय कि है जब हमलोग बच्चे थे तो यह एक छोटा कस्बा था पर अब यह शहर का रूप ले चुका है। मेरे गांव पनेरीबांध से इसकी दूरी कोई दो किलोमीटर रही होगी। आज यहां जाने के लिए सड़क बन चुकी है पर हमलोग यहां कच्चे रास्ते और कियारी (खेत) की आरी (मेड़) पर कूदते (भागते) हुए जाते थे।

हम दोनों भाई बाबा-माई से पांच-सात रुपये हासिल कर लेते थे। साथ में होते थे रिश्ते में चाचा पर बिलकुल मित्र जैसे। ये थे नीरज, बाबा, अनिल, सुनील, राकेश आदि। इनकी थैली में भी कुछ रुपये होते थे। चैनपुर पहुंचते ही सबसे पहला लक्ष्य होता था कि किसी तरह रथ को खींचने वाले रस्से तक पहुंचना और उसे खींच कर अपनी हाजिरी लगाना। जिसने सबसे पहले रथ खींचने का अवसर पा लिया उसके लिए यह मेडल जीतने के समान हो जाता था।

रथ खींचने के बाद शुरू होता था मस्ती का दौर। रथयात्रा के पूरे रास्ते में दोनों तरफ भीड़ तो होती ही थी अनरसा की कई दुकानें सजी होती थी। हम सभी कितना खाते थे आज इसका अंदाज लगाते हैं तो लगता है कि पता नहीं हाजमा कैसे नहीं बिगड़ता था। अनरसा ही नहीं रसगुल्ला, काला जामुन, लकठो जैसी मिठाइयां और कचौड़ी, छोले, पकौड़ी उदरस्थ करने में भी कोई कठिनाई नहीं होती थी।

उस समय एक मजेदार बात होती थी चैनपुर के दो मित्रों से मिलना। पहले आज की तरह बहुत सारे कपड़े बच्चों के पास नहीं होते थे। या तो स्कूल ड्रेस होता था नहीं तो दो भाई हुए तो दोनों के एक जैसे एक-दो जोड़ी कपड़े। कई बार हम दोनों का आमना-सामना भानु प्रताप सिंह और अमूल्य प्रताप सिंह से होता तो उनके कपड़े भी वैसे ही होते जैसे हम दोनों भाइयों के। शर्माते हुए हम लोग एक-दूसरे से कहते, ‘तोहिनियो के ई साल एके लेखे ड्रेस सिआइल हऊ।’ जवाब होता, ‘हां, ईयार, का करिअउ। आज फिर इच्छा होती है कि वे दोनों भाई फिर मिलें और हमारे कपड़े भी एक जैसे हों और हम शर्माते हुए नहीं ठहाका लगाते हुए कहें, ‘देख ईयार अभियो हमीन एके लेखे ड्रेस पहिनी ला।

रथयात्रा से चैनपुर प्रखंड के काफी लोगों की यादें जुड़ी हैं। एक याद का जिक्र कर रहा हूं। यह लगभग 1958-60 कि बात है, तब रुपया नहीं आना का युग का। पापा यानि कि प्रो. सुभाष चन्द्र मिश्रा बताते हैं कि ‘वे अपने ममेरे भाइयों जयदेव पाठक, सीताराम पाठक, देवेंद्र पाठक आदि के साथ रथयात्रा देखने जाते थे। बढ़का मामा उन्हें साथ ले जाते और चैनपुर पहुंचने पर एक जगह बता कर चले जाते कि घूर-फिर के तोहनी इहईं आके बईठ जइह।

आज लोग मोबाइल के लोकेशन और गूगल मैप के सहारे कहीं भी पहुंच जाते हैं पर उस समय हर जगह एक तय निशानी होती थी जो गूगल मैप या मोबाइल लोकेशन से ज्यादा सटीक होती थी। क्या मजाल कि चार-पांच घंटे में इधर-उधर घूमने के बाद लोग वहां सही समय पर इकट्ठे न हो जाएं। पापा के समय आना का जमाना था। एक रुपया यानी सोलह आना। वे लोग एक आना लेकर रथयात्रा देखने जाते थे। एक पैसा का अनरसा, एक पैसा का रसगुल्ला-कालाजामुन (वो भी काफी बड़ा), एक पैसा का नमकीन। एक पैसा का कुछ और फिर दो पैसा जो बचा उससे घर के लिए अनरसा।

चैनपुर की रथयात्रा किशुनदाहा तक जाती है। यह भगवान की मौसी बाड़ी है। पापा कहते हैं, ‘यहां पर एक सोत (नाला) बहता है। इसके किनारे कुसुम के पेड़ हैं। जब कुसुम के पुष्प सोत में गिरकर दहते (बहते) होंगे तो इसका नाम कुसुमदाहा पड़ा होगा। लगता है आज यह अपभ्रंशित होकर किशुनदाहा हो गया है।’ हालांकि वे यह भी कहते हैं कि यह उनकी कल्पना भी हो सकती है।

चैनपुर में रथयात्रा की परंपरा यहां के राज परिवार ने शुरू कराई थी। यहां के राजा भगवान जगन्नाथ स्वामी के भक्त थे। आज वहां पूजा-अर्चना तो हो रही है पर सार्वजनिक रथयात्रा नहीं निकाली जा रही है। प्रभु की इच्छा के विपरीत कुछ भी संभव नहीं है। अगले साल सबकुछ ठीक हो और लोग पूरे मनोयोग और उत्साह से यहां की रथयात्रा में शामिल हों यहीं भगवान से प्रार्थना है।
वरिष्ठ पत्रकार प्रभात मिश्रा

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