क्या है बकरीद का इतिहास, जानें क्यों और कैसे मनाया जाता है यह त्योहार

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लाइव पलामू न्यूज: ईद-उल-अजहा जिसे बकरीद के नाम से भी जाना जाता है मुस्लिम समाज का महत्वपूर्ण त्योहार है. पूरे विश्व के मुस्लिम समुदाय ईद-उल-अजहा को त्याग और बलिदान का त्योहार मनाते है. इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक 12वें महीने की 10 तारीख को बकरीद/ ईद-उल-जुहा मनाई जाती है. बकरीद रमजान माह के खत्म होने के लगभग 70 दिनों के बाद मनाई जाती है. बता दें ईद के बाद यह इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार है

इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे हजरत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा की राह में कुर्बान करने का फैसला किया था,लेकिन खुदा ने उनके जज्बे को देखकर उनके बेटे को जीवनदान दिया था उनके बेटे के जगह पे एक बकरे की कुर्बानी दिया गया था।

हजरत इब्राहिम को 90 वर्ष की आयु में एक बेटा हुआ जिसका नाम उन्होंने इस्माइल रखा. एक दिन अल्लाह ने हजरत इब्राहिम को अपने प्रिय चीजों को कुर्बान करने का आदेश सुनाया. इसके बाद एक दिन दोबारा हजरत इब्राहिम के सपने में अल्लाह ने उनसे अपने सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देने को कहा तब हज़रत इब्राहिम ने अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए.

हजरत इब्राहिम को लग रहा था कि कुर्बनी देते वक्त उनकी भावनाएं उनकी राह में आ सकती हैं. इसलिए उन्होंने अपनी आंख पर पट्टी बांध कर कुर्बानी दी. उन्होंने जब अपनी आंखों से पट्टी हटाई तो उन्हें अपना बेटा जीवित नजर आया. वहीं कटा हुआ दुम्बा (सउदी में पाया जाने वाला भेड़ जैसा जानवर) पड़ा था. इसी वजह से बकरीद पर कुर्बानी देने की प्रथा की शुरुआत हुई.

बकरीद को हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है. इसके बाद इस दिन जानवरों की कुर्बानी दी जाने लगी. बकरीद पर मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ मस्जिद में सुबह में ईद उल अजहा की नमाज अदा करते हैं. इसके बाद बकरे की कुर्बानी दी जाती है. कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा(तकसीम) जाता है. एक हिस्सा गरीबों, दूसरा रिश्तेदारों और तीसरी हिस्सा अपने लिए रखा जाता है।

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